Skip to main content

Posts

भारतीय मुस्लिमों को पाकिस्तानी कहना अपराध तो उनका क्या जो कहते हैं- पाकिस्तान जिंदाबाद

एआइएमआइएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी अपने विवादित बयानों के कारण हमेशा चर्चा में रहते हैं। प् हले वह लोकसभा में अपने एक विवादित वक्तव्य के कारण चर्चा में रहे। उनके अनुसार, ‘भारत में रहने वाले मुसलमानों ने जिन्ना के विचारों (दो राष्ट्र सिद्धांत) को खारिज कर दिया था। ऐसे में जो लोग भारतीय मुस्लिमों को आज भी ‘पाकिस्तानी’ कहकर बुलाते हैं, उन्हें गैर- जमानती कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए।’ देश के मुसलमानों के संदर्भ में जो कुछ ओवैसी ने कहा वह पूरा सच नहीं है। नि:संदेह, किसी भी भारतीय को ‘पाकिस्तानी’ कहना उसे कलंकित करने जैसा है। उसका एक स्पष्ट कारण भी है। उनका ताजा विवादित बयान यह था कि जम्मू के सुंजवां में आंतकी हमले में जिन पांच कश्मीरी मुसलमानों ने अपना बलिदान दिया है उनके बारे में बात क्यों नहीं हो रही है? देश के मुसलमानों के संदर्भ में जो कुछ ओवैसी ने कहा वह पूरा सच नहीं है। नि:संदेह, किसी भी भारतीय को ‘पाकिस्तानी’ कहना उसे कलंकित करने जैसा है। उसका एक स्पष्ट कारण भी है। पाकिस्तान अपने जन्म से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर भारत से युद्ध कर रहा है। हर दूसरे दिन सीमापार से होने वाले आतंकवा...

जो लोग राम मंदिर को तोड़ने के लिए बाबर को दोषी नहीं मानते उन्हें बाबरनामा जरूर पढ़ना चाहिए

हमारे देश में एक बहस छिड़ी हुई है कि राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गयी। एक तबका कहता है कि राम मंदिर को बाबर ने तुडबाया और वहां पर मस्जिद का निर्माण करवाया और दूसरा कथित सेक्युलर वादी जिसे इतिहास को अपने हिसाब से पेश करने में ज्यादा आनंद आता है कहता है बाबर तो सहिषुण था बाबरी मस्जिद का निर्माण उसने नहीं करवाया। अभी कोई बाबर के वंशज भी बोल रहा था कि बाबर ने राममंदिर का का विध्वंस किया होतो में माफ़ी मांगने को तैयार हूँ।     मैं ऐसे लोगों को कहूंगा की भ्रमित लोगो बाबर नामा पढ़ो जिससे तुम बाबर की राय जान सको हिंदुस्तान के बारे में। जो खुद बाबर ने लिखा है। शायद उनकी राय बदल जाये ? दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जिसका कोई अतीत न हो अतीत अच्छा या बुरा दोनों प्रकार का हो सकता है। इतिहास तो इतिहास होता है उसमे अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता। शायद भारत ही ऐसा देश जहाँ इतिहास को तोड़ मरोड़कर अपने सुविधा जनक तरीके से पेश किया जाता है।  प्राचीन भारत के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक इतिहास को गलत तरीके से पेश करने और विधि, राजनीति एवं विज्ञान के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों ...

न्यूनतम समर्थन मूल्य की जटिल गुत्थी, क्या किसानों को मिलेगा फायदा

दो दशक पहले भारत में एक महान अक्रांति की शुरुआत हुई जिसे हम नई अर्थव्यवस्था कहते हैं। पांच फीसदी के आंकडे़ पर ही ठिठकी विकास दर को रफ्तार देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश और सरकारी लाइसेंस कोटा परमिट राज की जकड़बंदी खत्म करने की घोषणा को बीसवीं सदी की सबसे अहम घटना माना गया। यह तब भी नजरअंदाज किया गया कि दल बदलने में माहिर भ्रष्ट भारतीय नेता और नौकरशाही सरकारी ताकत के मूल और चुनावी चंदे के अक्षय पात्र, लाइसेंस कोटा परमिट राज को त्यागने की तनिक भी उतावली न दिखाएंगे। अब तक सरकारें भले ही बदली हों, राज्यों में किसानी से शिक्षा तक की सारी राजकीय या निजी संस्थाओं में पुराने बिचौलियों की ही धमक कायम है। नई अर्थव्यवस्था का घोषित दर्शन यह था कि सरकारी नियम पारदर्शी होंगे तो भ्रष्टाचार कम होगा, मेहनती को मौका मिलेगा, नए उद्योग खुलेंगे, रोजगार बढ़ेंगे और फर्श से अर्श पर जा पहुंचे सफल नए कार्पोरेट्स उन ग्रामीण गरीबों के हक में अपना सामाजिक उत्तरदायित्व जरूर निभाएंगे जिनके बीच से वे आए हैं। 19वीं सदी में अमेरिका और यूरोप में यही हुआ। भारतीय परिदृश्य में खेती अब भी अहम आज निजी क्षेत्र म...

जय जवान जय किसान !,:कश्मीर के 16 वर्षीय युवाओं के आतंकी बनने का आधा सच

आतंक से भी अधिक विकृत होता है झूठ।' - अज्ञात कश्मीर से झूठ ही सामने आते हैं। सभ्य भाषा में आधा सच कहना बेहतर होगा। ताजे आधे सच डरावने हैं। पहला है 16 वर्षीय फरदीन का। उसने सेंट्रल रिजर्व पोलिस फोर्स(सीआरपीएफ) कैम्प पर आत्मघाती हमला किया। पांच जवान शहीद। और भारी चर्चा में आ गया। कि कश्मीर में "होमग्रोन" टेरर बढ़ गया है। बच्चे-युवा इस्लाम को खतरे में देख, बम बांधकर खुद मरने और मारने को तत्पर हो रहे हैं। सेना व अर्धसैनिक बलों के "अत्याचार" के विरूद्ध नौजवान खड़े हो रहे हैं। दूसरा सच है- आतंक को फलने-फूलने, फैलाने के लिए पैसा लगाने वालों के खिलाफ चार्जशीट। टेरर फंडिंग की इस कानूनी कार्रवाई में पाकिस्तान और उससे पैसे लेकर आतंक चलाने वाले हाफिज सईद और सैयद सलाउद्दीन नामक दो अपराधियों के नाम हैं। साथ ही कश्मीरी अलगाववादी हुर्रियत के कई नेताओं के। दोनों आधे सच, वास्तव में एक-दूजे से जुड़े हुए हैं। और मिलाकर पूरा, बड़ा झूठ सामने लाते हैं। देखिए, कैसे? पहले फरदीन या 16-18 की उम्र के कश्मीरियों के अातंक के प्रति बढ़ते रुझान का सच। फरदीन मोहम्मद खंडे चर्चा में इसल...

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? चरखे से आजादी कैसे ?

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? : दोस्तों हम बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं कि आजादी एक परिवार के बलिदान और त्याग की वजह से और गाँधी जी की सीखों से आयी है। जिसका प्रमाण हमें नौ लाख योजना और इमारतें  जो एक परिवार के नाम पर चल रही हैं, हिंदुस्तान में लगभग सत्तर से अस्सी हज़ार ऐसी सड़कें हैं जो एक परिवार  नाम पर हैं। क्यों ? कितने चढ़े फांसी पर और  कितनो ने गोली खायी थी , क्यूँ झूट  साहब कि  चरखे से आजादी आयी थी।  हिंदुस्तान के इतिहास का दुर्भाग्य है कि उसको तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। हमने सिकंदर को विश्व विजेता बता दिया और महाराज पुरु को भुला दिया जबकि यूरोपियन इतिहास में स्पष्ट है सिकंदर हिंदुस्तान से हार कर गया था। हमने अकबर को महान बना दिया परन्तु महाराणा प्रताप को........? हमने कालू बाल्मीकि के बलिदान को जाति के जहर में घोल कर भुला दिया। ऐसे तमाम उदाहरण मिलेंगे आपको।  ऐसे ही हमने या हमारे देश के इतिहास लेखकों ने या चाटुकार लेखकों ने इतिहास लिखने में चाटुकारिता दिखाई है वो किसी भी तरह से तथ्यों पर खरी नहीं उतरती है।  मैं आभारी हूँ गाँधी जी की...

चाणक्य ने कहा है कि अज्ञान के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं

अज्ञान आपका घातक शत्रु है, जबकि ज्ञान हितैषी मित्र। ज्ञान जीवन के लिए आशा, उमंग, प्रेरणा, उत्साह व आनंद के इतने गवाक्ष खोल देता है कि जीवन का क्षण-क्षण ईश्वर का अनमोल उपहार प्रतीत होता है। एक सृजनशील क्षण आपको प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर प्रतिस्थापित कर सकता है, जबकि कुविचार की अवस्था में क्षण भर का निर्णय आपको निकृष्टता की गर्त में धकेलकर जन्म-जन्मांतरों के लिए आपको लांछित व कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। अज्ञान हमें निराशा और पतन की ओर ले जाता है, जबकि ज्ञान आात्मिक उन्नति का पर्याय बन जीवन समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नयन की आधारशिला भी बनाता है। जीवन में यत्र-तत्र-सर्वत्र आनंद व सृजन का सौरभ प्रवाहित करता रहता है। चाणक्य ने कहा है कि ‘अज्ञान के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।’ अज्ञान के अंधकार में ज्ञान रूपी प्रकाश के अभाव में भविष्य रूपी भाग्य की राहें अदृष्ट हो जाती हैं और मनुष्य असहाय होकर अपने कर्म व चिंतन की दहलीज पर ही ठोकरें खाने को विवश होता है। मंजिल व लक्ष्य पास होने पर भी वह उसे न पाने के लिए अभिशप्त होता है। फिर वह अपनी ही सोच व कर्म के चक्रव्यूह में फंसकर भय से प्रकंपित ह...

आज समाज बिखर रहा है क्योंकि भावना का परित्याग कर दिया गया है

बुद्धि का विकास आवश्यक है। हम बुद्धि का विकास किस ओर करते हैं, यह बात विचारणीय है। बुद्धि का विकास हम दो दिशा में कर सकते हैं। प्रथम, हम बुद्धि को सही दिशा देकर उसे ज्ञान की उच्चतम अवस्था की उपलब्धि करा सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम बुद्धि को बाह्य जगत से मोड़कर अपने अंतर्मन की ओर अग्रसारित करा सकते हैं, जिससे वह अपनी आत्मा के आलोक को प्राप्त कर ले और यही मनुष्य जन्म प्राप्त करने का सच्चा व यथार्थ उद्देश्य है। देश में इसी दिशा की ओर सभी महापुरुष चले हैं। उनके द्वारा वह उन्नति प्राप्त की गई है। इस कारण उन्होंने समाज व संसार को सही रास्ता दिखलाया। बुद्धि भावना से जुड़कर आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर पाती है। इसके विपरीत बुद्धि जब भावना का परित्याग करते हुए मात्र बुद्धिवादी बनकर आगे बढ़ती है, तब वह इंद्रियों के सुखों की पोषक होती है। वह इस ओर लग जाती है कि किस प्रकार से शरीर के सुख के लिए अधिक से अधिक योगदान किया जा सके। शरीर सुख ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है। जैसा कि आजकल दृष्टिगोचर हो रहा है। आज समाज बिखर रहा है। क्यों? इसलिए कि लोग केवल बुद्धिवादी होकर रह गए हैं। भावना का परित्याग कर दि...