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आज समाज बिखर रहा है क्योंकि भावना का परित्याग कर दिया गया है

बुद्धि का विकास आवश्यक है। हम बुद्धि का विकास किस ओर करते हैं, यह बात विचारणीय है। बुद्धि का विकास हम दो दिशा में कर सकते हैं। प्रथम, हम बुद्धि को सही दिशा देकर उसे ज्ञान की उच्चतम अवस्था की उपलब्धि करा सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम बुद्धि को बाह्य जगत से मोड़कर अपने अंतर्मन की ओर अग्रसारित करा सकते हैं, जिससे वह अपनी आत्मा के आलोक को प्राप्त कर ले और यही मनुष्य जन्म प्राप्त करने का सच्चा व यथार्थ उद्देश्य है। देश में इसी दिशा की ओर सभी महापुरुष चले हैं। उनके द्वारा वह उन्नति प्राप्त की गई है। इस कारण उन्होंने समाज व संसार को सही रास्ता दिखलाया। बुद्धि भावना से जुड़कर आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर पाती है। इसके विपरीत बुद्धि जब भावना का परित्याग करते हुए मात्र बुद्धिवादी बनकर आगे बढ़ती है, तब वह इंद्रियों के सुखों की पोषक होती है। वह इस ओर लग जाती है कि किस प्रकार से शरीर के सुख के लिए अधिक से अधिक योगदान किया जा सके। शरीर सुख ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है। जैसा कि आजकल दृष्टिगोचर हो रहा है। आज समाज बिखर रहा है। क्यों? इसलिए कि लोग केवल बुद्धिवादी होकर रह गए हैं। भावना का परित्याग कर दिया गया है। बुद्धि की बाजीगरी चल रही है।
लोग कैसे-कैसे झूठ, फरेब, छल, कपट को ओढ़ते चले जा रहे हैं। बुद्धि से तमाम पैंतरे करते रहते हैं। हर तरफ बिखराव की स्थिति दिखाई पड़ती है। सब एक-दूसरे को दोष देते रहते हैं, मगर वे क्यों नहीं समझ पाते कि भाव का परित्याग कर केवल बुद्धिवादी बनकर वैतरणी नहीं पार की जा सकती। आज बुद्धि की समस्त चेष्टाएं संसार की ओर अग्रसर हो चुकी हैं। ठगी का बाजार गर्म है। वे इस बात को भूल गए हैं कि हम किस देश के रहने वाले हैं, जहां बुद्धि का विकास अपने चरमोत्कर्ष पर रहा है। बुद्धि को संसार में उतना ही प्रयुक्त किया जाता रहा है जिससे सही जीवनयापन हो सके, न कि अंधी सांसारिक सुखों की दौड़ में लहूलुहान हो जाए। अब पुन: बाहर की दौड़ पर लगाम लगाकर अपने यथार्थ सुख की प्राप्ति की ओर बुद्धि को ले जाना होगा। बुद्धि को रचनात्मक कार्यों की ओर लगाना होगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन लोगों ने बुद्धि को ध्वंसात्मक कार्यों की और लगाया, वे अंतत: पराजित ही हुए।

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