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न्यूनतम समर्थन मूल्य की जटिल गुत्थी, क्या किसानों को मिलेगा फायदा

दो दशक पहले भारत में एक महान अक्रांति की शुरुआत हुई जिसे हम नई अर्थव्यवस्था कहते हैं। पांच फीसदी के आंकडे़ पर ही ठिठकी विकास दर को रफ्तार देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश और सरकारी लाइसेंस कोटा परमिट राज की जकड़बंदी खत्म करने की घोषणा को बीसवीं सदी की सबसे अहम घटना माना गया। यह तब भी नजरअंदाज किया गया कि दल बदलने में माहिर भ्रष्ट भारतीय नेता और नौकरशाही सरकारी ताकत के मूल और चुनावी चंदे के अक्षय पात्र, लाइसेंस कोटा परमिट राज को त्यागने की तनिक भी उतावली न दिखाएंगे। अब तक सरकारें भले ही बदली हों, राज्यों में किसानी से शिक्षा तक की सारी राजकीय या निजी संस्थाओं में पुराने बिचौलियों की ही धमक कायम है। नई अर्थव्यवस्था का घोषित दर्शन यह था कि सरकारी नियम पारदर्शी होंगे तो भ्रष्टाचार कम होगा, मेहनती को मौका मिलेगा, नए उद्योग खुलेंगे, रोजगार बढ़ेंगे और फर्श से अर्श पर जा पहुंचे सफल नए कार्पोरेट्स उन ग्रामीण गरीबों के हक में अपना सामाजिक उत्तरदायित्व जरूर निभाएंगे जिनके बीच से वे आए हैं। 19वीं सदी में अमेरिका और यूरोप में यही हुआ। भारतीय परिदृश्य में खेती अब भी अहम आज निजी क्षेत्र म...

जय जवान जय किसान !,:कश्मीर के 16 वर्षीय युवाओं के आतंकी बनने का आधा सच

आतंक से भी अधिक विकृत होता है झूठ।' - अज्ञात कश्मीर से झूठ ही सामने आते हैं। सभ्य भाषा में आधा सच कहना बेहतर होगा। ताजे आधे सच डरावने हैं। पहला है 16 वर्षीय फरदीन का। उसने सेंट्रल रिजर्व पोलिस फोर्स(सीआरपीएफ) कैम्प पर आत्मघाती हमला किया। पांच जवान शहीद। और भारी चर्चा में आ गया। कि कश्मीर में "होमग्रोन" टेरर बढ़ गया है। बच्चे-युवा इस्लाम को खतरे में देख, बम बांधकर खुद मरने और मारने को तत्पर हो रहे हैं। सेना व अर्धसैनिक बलों के "अत्याचार" के विरूद्ध नौजवान खड़े हो रहे हैं। दूसरा सच है- आतंक को फलने-फूलने, फैलाने के लिए पैसा लगाने वालों के खिलाफ चार्जशीट। टेरर फंडिंग की इस कानूनी कार्रवाई में पाकिस्तान और उससे पैसे लेकर आतंक चलाने वाले हाफिज सईद और सैयद सलाउद्दीन नामक दो अपराधियों के नाम हैं। साथ ही कश्मीरी अलगाववादी हुर्रियत के कई नेताओं के। दोनों आधे सच, वास्तव में एक-दूजे से जुड़े हुए हैं। और मिलाकर पूरा, बड़ा झूठ सामने लाते हैं। देखिए, कैसे? पहले फरदीन या 16-18 की उम्र के कश्मीरियों के अातंक के प्रति बढ़ते रुझान का सच। फरदीन मोहम्मद खंडे चर्चा में इसल...

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? चरखे से आजादी कैसे ?

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? : दोस्तों हम बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं कि आजादी एक परिवार के बलिदान और त्याग की वजह से और गाँधी जी की सीखों से आयी है। जिसका प्रमाण हमें नौ लाख योजना और इमारतें  जो एक परिवार के नाम पर चल रही हैं, हिंदुस्तान में लगभग सत्तर से अस्सी हज़ार ऐसी सड़कें हैं जो एक परिवार  नाम पर हैं। क्यों ? कितने चढ़े फांसी पर और  कितनो ने गोली खायी थी , क्यूँ झूट  साहब कि  चरखे से आजादी आयी थी।  हिंदुस्तान के इतिहास का दुर्भाग्य है कि उसको तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। हमने सिकंदर को विश्व विजेता बता दिया और महाराज पुरु को भुला दिया जबकि यूरोपियन इतिहास में स्पष्ट है सिकंदर हिंदुस्तान से हार कर गया था। हमने अकबर को महान बना दिया परन्तु महाराणा प्रताप को........? हमने कालू बाल्मीकि के बलिदान को जाति के जहर में घोल कर भुला दिया। ऐसे तमाम उदाहरण मिलेंगे आपको।  ऐसे ही हमने या हमारे देश के इतिहास लेखकों ने या चाटुकार लेखकों ने इतिहास लिखने में चाटुकारिता दिखाई है वो किसी भी तरह से तथ्यों पर खरी नहीं उतरती है।  मैं आभारी हूँ गाँधी जी की...

चाणक्य ने कहा है कि अज्ञान के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं

अज्ञान आपका घातक शत्रु है, जबकि ज्ञान हितैषी मित्र। ज्ञान जीवन के लिए आशा, उमंग, प्रेरणा, उत्साह व आनंद के इतने गवाक्ष खोल देता है कि जीवन का क्षण-क्षण ईश्वर का अनमोल उपहार प्रतीत होता है। एक सृजनशील क्षण आपको प्रतिष्ठा के उत्तुंग शिखर पर प्रतिस्थापित कर सकता है, जबकि कुविचार की अवस्था में क्षण भर का निर्णय आपको निकृष्टता की गर्त में धकेलकर जन्म-जन्मांतरों के लिए आपको लांछित व कलंकित करने के लिए पर्याप्त है। अज्ञान हमें निराशा और पतन की ओर ले जाता है, जबकि ज्ञान आात्मिक उन्नति का पर्याय बन जीवन समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नयन की आधारशिला भी बनाता है। जीवन में यत्र-तत्र-सर्वत्र आनंद व सृजन का सौरभ प्रवाहित करता रहता है। चाणक्य ने कहा है कि ‘अज्ञान के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है।’ अज्ञान के अंधकार में ज्ञान रूपी प्रकाश के अभाव में भविष्य रूपी भाग्य की राहें अदृष्ट हो जाती हैं और मनुष्य असहाय होकर अपने कर्म व चिंतन की दहलीज पर ही ठोकरें खाने को विवश होता है। मंजिल व लक्ष्य पास होने पर भी वह उसे न पाने के लिए अभिशप्त होता है। फिर वह अपनी ही सोच व कर्म के चक्रव्यूह में फंसकर भय से प्रकंपित ह...

आज समाज बिखर रहा है क्योंकि भावना का परित्याग कर दिया गया है

बुद्धि का विकास आवश्यक है। हम बुद्धि का विकास किस ओर करते हैं, यह बात विचारणीय है। बुद्धि का विकास हम दो दिशा में कर सकते हैं। प्रथम, हम बुद्धि को सही दिशा देकर उसे ज्ञान की उच्चतम अवस्था की उपलब्धि करा सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम बुद्धि को बाह्य जगत से मोड़कर अपने अंतर्मन की ओर अग्रसारित करा सकते हैं, जिससे वह अपनी आत्मा के आलोक को प्राप्त कर ले और यही मनुष्य जन्म प्राप्त करने का सच्चा व यथार्थ उद्देश्य है। देश में इसी दिशा की ओर सभी महापुरुष चले हैं। उनके द्वारा वह उन्नति प्राप्त की गई है। इस कारण उन्होंने समाज व संसार को सही रास्ता दिखलाया। बुद्धि भावना से जुड़कर आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर पाती है। इसके विपरीत बुद्धि जब भावना का परित्याग करते हुए मात्र बुद्धिवादी बनकर आगे बढ़ती है, तब वह इंद्रियों के सुखों की पोषक होती है। वह इस ओर लग जाती है कि किस प्रकार से शरीर के सुख के लिए अधिक से अधिक योगदान किया जा सके। शरीर सुख ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है। जैसा कि आजकल दृष्टिगोचर हो रहा है। आज समाज बिखर रहा है। क्यों? इसलिए कि लोग केवल बुद्धिवादी होकर रह गए हैं। भावना का परित्याग कर दि...

क्या गांवों की ओर चलें, क्योंकि दिल्ली-NCR क्षेत्र रहने लायक नहीं रहा

विश्व स्तर पर ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग रहते हैं। 2007 में पहली बार इतिहास में वैश्विक शहरी आबादी वैश्विक ग्रामीण जनसंख्या से अधिक हुई और दुनिया की जनसंख्या इसके बाद मुख्य रूप से शहरी बनी हुई है। 21वीं शताब्दी के शहरी इलाकों का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण विकास चुनौतियों में से एक बन गया है। निरंतर शहरों के निर्माण में हमारी सफलता या विफलता 2015 के बाद के संयुक्त राष्ट्र विकास एजेंडे की सफलता में एक प्रमुख कारक होगी। विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है इस शताब्दी में चार मेगा ट्रेंड उभरे हैं, शहरीकरण उनमें से एक है। आज विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है जो 2050 तक बढ़कर 66 प्रतिशत हो जाने की संभावना है। हालांकि 2030 तक इसके 60 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। दूसरे शब्दों में कहें तो 2050 तक शहरी क्षेत्रों में रहने के लिए अतिरिक्त 2.5 अरब लोगों की भविष्यवाणी की गई है। शीर्ष 600 शहरी केंद्रों की वैश्विक जीडीपी में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। करीब एक अरब लोग मलिन बस्तियों में रहते हैं जो कि हमारी वैश्विक आबादी का ...

योर लॉर्डशिप; राष्ट्र के समक्ष कोई बड़ा खतरा है- तो कृपया सामने लाइए

आने  वाली पीढ़ियां सहज विश्वास ही नहीं कर पाएंगी कि ऐसा हमारे न्यायिक इतिहास में घटा। अाखिर ये हुआ क्या? सुप्रीम कोर्ट के चार सर्वाधिक वरिष्ठ जज, यदि ऐसा करते हैं तो निश्चित ही उनके पास बहुत, बहुत ही बड़ा कारण रहा होगा। किन्तु जो उन्होंने बताया है, उसके अनुसार तो यह केवल महत्वपूर्ण मुकदमों को बांटने में हो रहे भेदभाव का विवाद है। यानी चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा पर चार जजों ने यह आरोप लगाया है कि वे अपनी पसंद से मुकदमे लिस्ट करते हैं। वरिष्ठता को अनदेखा कर। क्या इससे देश का लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा? जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर के आवास पर पत्रकारों को बुलाकर किए गए इस विस्फोट के अनेक पहलू हैं। जस्टिस चेलमेश्वर खुली किताब हैं। आंध्र के कृष्णा जिले में जन्मे चेलमेश्वर के पिता मछलीपट्‌नम में वकील थे। इस ज़मीनी पृष्ठभूमि के कारण ही वकालत और विद्रोह उनका नैसर्गिक स्वभाव है। इसलिए उनका खुलापन आश्चर्यजनक नहीं था। उनके ठीक अलग, चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ओडिशा से हैं। वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के भतीजे हैं। जस्टिस चेलमेश्वर, वास्तव में जस्टिस मिश्रा से भी वरिष्ठ...