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आज समाज बिखर रहा है क्योंकि भावना का परित्याग कर दिया गया है

बुद्धि का विकास आवश्यक है। हम बुद्धि का विकास किस ओर करते हैं, यह बात विचारणीय है। बुद्धि का विकास हम दो दिशा में कर सकते हैं। प्रथम, हम बुद्धि को सही दिशा देकर उसे ज्ञान की उच्चतम अवस्था की उपलब्धि करा सकते हैं। कहने का आशय यह है कि हम बुद्धि को बाह्य जगत से मोड़कर अपने अंतर्मन की ओर अग्रसारित करा सकते हैं, जिससे वह अपनी आत्मा के आलोक को प्राप्त कर ले और यही मनुष्य जन्म प्राप्त करने का सच्चा व यथार्थ उद्देश्य है। देश में इसी दिशा की ओर सभी महापुरुष चले हैं। उनके द्वारा वह उन्नति प्राप्त की गई है। इस कारण उन्होंने समाज व संसार को सही रास्ता दिखलाया। बुद्धि भावना से जुड़कर आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर पाती है। इसके विपरीत बुद्धि जब भावना का परित्याग करते हुए मात्र बुद्धिवादी बनकर आगे बढ़ती है, तब वह इंद्रियों के सुखों की पोषक होती है। वह इस ओर लग जाती है कि किस प्रकार से शरीर के सुख के लिए अधिक से अधिक योगदान किया जा सके। शरीर सुख ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है। जैसा कि आजकल दृष्टिगोचर हो रहा है। आज समाज बिखर रहा है। क्यों? इसलिए कि लोग केवल बुद्धिवादी होकर रह गए हैं। भावना का परित्याग कर दि...

क्या गांवों की ओर चलें, क्योंकि दिल्ली-NCR क्षेत्र रहने लायक नहीं रहा

विश्व स्तर पर ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अधिक लोग रहते हैं। 2007 में पहली बार इतिहास में वैश्विक शहरी आबादी वैश्विक ग्रामीण जनसंख्या से अधिक हुई और दुनिया की जनसंख्या इसके बाद मुख्य रूप से शहरी बनी हुई है। 21वीं शताब्दी के शहरी इलाकों का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण विकास चुनौतियों में से एक बन गया है। निरंतर शहरों के निर्माण में हमारी सफलता या विफलता 2015 के बाद के संयुक्त राष्ट्र विकास एजेंडे की सफलता में एक प्रमुख कारक होगी। विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है इस शताब्दी में चार मेगा ट्रेंड उभरे हैं, शहरीकरण उनमें से एक है। आज विश्व की 54 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है जो 2050 तक बढ़कर 66 प्रतिशत हो जाने की संभावना है। हालांकि 2030 तक इसके 60 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। दूसरे शब्दों में कहें तो 2050 तक शहरी क्षेत्रों में रहने के लिए अतिरिक्त 2.5 अरब लोगों की भविष्यवाणी की गई है। शीर्ष 600 शहरी केंद्रों की वैश्विक जीडीपी में लगभग 60 प्रतिशत हिस्सेदारी है। करीब एक अरब लोग मलिन बस्तियों में रहते हैं जो कि हमारी वैश्विक आबादी का ...

योर लॉर्डशिप; राष्ट्र के समक्ष कोई बड़ा खतरा है- तो कृपया सामने लाइए

आने  वाली पीढ़ियां सहज विश्वास ही नहीं कर पाएंगी कि ऐसा हमारे न्यायिक इतिहास में घटा। अाखिर ये हुआ क्या? सुप्रीम कोर्ट के चार सर्वाधिक वरिष्ठ जज, यदि ऐसा करते हैं तो निश्चित ही उनके पास बहुत, बहुत ही बड़ा कारण रहा होगा। किन्तु जो उन्होंने बताया है, उसके अनुसार तो यह केवल महत्वपूर्ण मुकदमों को बांटने में हो रहे भेदभाव का विवाद है। यानी चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा पर चार जजों ने यह आरोप लगाया है कि वे अपनी पसंद से मुकदमे लिस्ट करते हैं। वरिष्ठता को अनदेखा कर। क्या इससे देश का लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा? जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर के आवास पर पत्रकारों को बुलाकर किए गए इस विस्फोट के अनेक पहलू हैं। जस्टिस चेलमेश्वर खुली किताब हैं। आंध्र के कृष्णा जिले में जन्मे चेलमेश्वर के पिता मछलीपट्‌नम में वकील थे। इस ज़मीनी पृष्ठभूमि के कारण ही वकालत और विद्रोह उनका नैसर्गिक स्वभाव है। इसलिए उनका खुलापन आश्चर्यजनक नहीं था। उनके ठीक अलग, चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा ओडिशा से हैं। वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के भतीजे हैं। जस्टिस चेलमेश्वर, वास्तव में जस्टिस मिश्रा से भी वरिष्ठ...

महंगाई क्यूँ न बढे ?

दोस्तों, महंगाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिसके लिए हम सरकारों को दोषी ठहराते आ रहे हैं। पर क्या कभी सोचा है इसके लिए हमारी जीवन दोषी है। हम जिस प्रकार पाश्चात्य संस्कृति का अनुशरण कर रहे हैं वो न सिर्फ हमारी पुरातन संस्कृति के लिए बल्कि वो हमारे धन और जीवन दोनों को नुकशान पहुंचा रही है। कुछ कारण जो मेरी नजर में हैं वो में बता रहा हूँ। आजकल नहाने का साबुन अलग मिलेगा और हाथ धोने का साबुन अलग। पहले तो साबुन ही नहीं था।  था भी तो केवल नहाने का।  हाथ धोने के लिए राख या साफ़ मिटटी इस्तेमाल करते थे और कम से कम बीमार होते थे। टॉयलेट साफ़ करने का हार्पिक अलग और बाथरूम धोने का अलग। और हाँ टॉयलेट में खुशबू वाली टिकिया अलग से मिलेगी। क्यों भाई एसिड में क्या दिक्कत है। कपडे धोने के लिए तीन तरह के वाशिंग पॉवडर होने जरूरी हैं।  एक मशीन से धोने के लिए , एक हाथ से धोने के लिए और एक कपड़ों पर कोई दाग है तो वेनिश। पहले तो एक से ही काम चला लेते थे। उससे पहले केवल पानी से ही साफ करते थे। हाथ धोने के लिए भी लिक्विड आने लगे हैं क्यूंकि विज्ञापन वाले बोलते हैं कि साबुन से बैक्टीरिआ ट्रा...

पुलिस वाले की ज़िंदगी

"चौबीस घंटे की ड्यूटी, बदमाशों से निपटने का दबाव, त्योंहार भी कभी अपने परिवार के साथ नहीं मना पाते आदि आदि" ऐसी है हमारे पुलिसवालों की ज़िंदगी। इतना दबाव और शिद्दत से नौकरी करने के बाद भी बहुत कम देखने को मिलता है कि कभी किसी ने इनको दुआ दी हो। क्यों भाई क्या इनके दिल नहीं होता ? हमारे देश में तमाम ऐसी मुठभेड़ हुई हैं पुलिस और बदमाशों के बीच जिनका खूब हो हल्ला मचा है लेकिन एक भी ऐसी मुठभेड़ नहीं है जिसमे कोई पुलिस की तरफ से बोलने वाला हो चाहे इशरत जहाँ का मामला या म.प. में नौ सिमी आतंकियों को मारने का मामला।  कभी खड़ा नहीं हुआ इनके लिए। सब जानते थे कि मध्य  प्रदेश में सभी नौ के नौ हार्डकोर आतंकी थे पर नहीं ऊँगली पुलिस वालो पर ही  उठेगी। तमाम ऐसे संघठन हैं जो समाज के लिए काम करते हैं जैसे मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, भ्र्ष्टाचार निरोधक तंत्र इत्यादि। जो शायद आपने काम बखूबी निभा भी रहे होंगे। लेकिन अगर बात पुलिस की आती है तो सब हाबी हो जाते हैं। एक अपराधी जो पिछले कई सालों से अपराध की दुनिया में है।  जिसके लिए अपराध कोई मनोरंजन का साधन है। कई हत्या कर चुका है यदि वो ...

कैसे 2जी घोटाले के फैसले से निकला प्रॉसिक्यूशन घोटाला

‘‘यह सरकारी दस्तावेजों की मिस रीडिंग, सिलेक्टिव रीडिंग, नॉन-रीडिंग और आउट ऑफ कन्टैक्स्ट रीडिंग है ।" - जज ओपी सैनी, 2जी घोटाले में सीबीआई, प्रॉसिक्यूशन पर 2जी फैसले से हैरान समूचा राष्ट्र इसे सरल रूप से समझना चाहता है। किन्तु कानून और न्याय की उलझी, जटिल भाषा, प्रक्रिया और तरीके आसान नहीं हैं। फिर भी एक प्रयास। क्या सारे आरोपी नेता, अफ़सर, पूंजीपति सुबूतों-गवाहों के अभाव में छोड़ दिए गए हैं? - हां। क्या कोर्ट ने इन्हें ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ देकर छोड़ा है? - नहीं। फिर? - अन्य मुकदमों से हटकर है इसीलिए यह केस। कोर्ट ने सुबूत-गवाह पेश न कर पाने पर सीबीआई को कड़ी फटकार लगाई है। किन्तु फैसले के कई बिन्दु बताते हैं कि वह संदेह का लाभ नहीं दे रही। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कोई घोटाला हुआ ही नहीं। समूचे प्रॉसिक्यूशन को कोर्ट ने बुरी तरह लताड़ा है। वास्तव में देखा जाए तो 2जी घोटाला, निश्चित ही घोटाला था। आने वाले समय में ऊंची अदालतों में सबकुछ सामने आएगा। किन्तु इस मुकदमें में यह प्रॉसिक्यूशन घोटाला बनकर सामने आया है। कैसे? एक-एक कर देखते हैं : जो सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष फैस...

फारुख साहब क्या साबित करना चाहते हो?

"फारुख अब्दुल्ला " से सब वाक़िफ़ हैं। ये जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं।  वर्तमान में ये नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया हैं। अब बात करते हैं इनके बयानों की जो कुछ दिनों से अपने अजीबो गरीब मायनो से शर्मनाक बयान बन गए हैं। कभी ये महाशय कहते हैं जम्मू-कश्मीर में कोई तिरंगा थामने वाला नहीं मिलेगा, , P.O.K.  को आज़ाद कश्मीर बोल देते हैं। अभी गुजरात चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद बोला "हिंदुस्तान ख़त्म हो जायेगा" .   क्या साहब , क्या साबित करना चाहते हो ? क्या आप दूसरा जिन्ना बनना चाहते हो ? आप छुप कर अलगाव वादियों की भाषा बोलते थे अब खुल कर खड़े होना चाहते हो क्या ? या कुर्सी जाने के गम में मानसिक संतुलन गड़बड़ा दिए हो ? हिंदुस्तान किसी राजनेता की कुर्सी नहीं जो खत्म हो जायेगा। ये युगों युगों से था और युगों युगों तक रहेगा भी। आपके जैसे किसी एक शख्स के कह देने मात्र से कुछ नहीं होने वाला। डेमोक्रेसी में विरोध किया जाना चाहिए पर क्या इस तरह से ? आप बीजेपी या मोदी के विरोधी हो सकते हो तो विरोध करो पर राष्ट्र विरोधी क्यों बन रहे हो। जिन्ना के पद...