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ना स्वर है ना सरगम है, ना लय ना तराना है हनुमान के चरणों में, एक फूल चढ़ाना है ।। टेर।। तुम बाल रूप में प्रभु, सूरज को निगल डाले अभिमानी सुरपति के, सब दर्प मसल डाले बजरंग हुए तब से, संसार ये जाना है ।। हनुमान ।। सब दुर्ग ढहा करके, लंका को जलाये तुम सीता की खबर लाये, लक्ष्मण को बचाये तुम प्रिय भरत सरिस तुम को, श्रीराम ने माना है ।। हनुमान ।। जब राम नाम तुम ने, पाया ना नगीने में तुम फाड़ दिये सीना, सीया राम थे सीने में विस्मित जग ने देखा, कपि राम दीवाना है ।। हनुमान ।। हे अजर अमर स्वामी, तुम हो अन्तर्यामी ये दीन हीन चंचल अभिमानी अज्ञानी तुम ने जो नजर फेरी, फिर कौन ठिकाना है ।। हनुमान ।।

गरीब

गरीब कॆ घर बॆटियाँ और रॊटियाँ दॊनॊं आनॆ सॆ कतराती हैं ॥ क्यॊंकि गरीब कॆ घर अपनॆ आप कॊ अब यह सुरक्षित नहीं पाती हैं ॥ इस समाज मॆं दॊ दानव ख़ास हैं, जिनकॆ नाम अमीर और अय्याश हैं, एक की नज़र हॊती है गरीब की रॊटी पर ॥ और दूसरॆ की नज़र है गरीब की बॆटी पर ॥ सच ही तॊ है एक गरीब बाप दॊ वक्त की रॊटी भला कैसॆ कमायॆगा ॥ और बिना दहॆज़ अपनी बॆटी का हाँथ किस कॊ थमायॆगा ॥ बॆचारा गरीब यदि मॆहनत करकॆ रॊटी कमा भी लॆता है और अपनी बॆटी का हाँथ बिना दहॆज़ थमा भी दॆता है ॥ नतीजा गरीब की रॊटी घर मॆं बिना घासलॆट कॆ पिघल जाती है ॥ और बॆटी ससुराल मॆं दहॆज़ कॆ घासलॆट सॆ जल जाती है ॥ दहॆज़ कॆ घासलॆट सॆ जल जाती है ॥ '/

भगवान संदेश वाहक है और धर्मग्रंथ उनके संदेश

भगवान कृष्ण ने 18 अध्याय का उपदेश देने में अपना वक्त क्यों जाया किया। अर्जुन के हर सवाल का जवाब देने में? आखिर अर्जुन को धर्मयुद्ध के लिए समझाने-बुझाने, मनाने, राजी करने की क्या जरूरत थी? भगवद् गीता की जरूरत ही क्या थी? कृष्ण को तो अर्जुन से बस यह कहना चाहिए था, 'मेरे तीन चक्कर लगाओ, थोड़ा घी और दूध चढ़ाओ, देह पर चंदन का लेप लगाओ, मेरे चरणों पर लेट जाओ, चार बार साष्टांग प्रणाम करो और धनुष-बाण उठाकर युद्ध के मैदान पर कूद पड़ो... तुम्हारी जीत तय है।' जरा इस बारे में सोचें कि आखिर अर्जुन को इतना संघर्ष क्यों करना पड़ा? उनके लिए क्या संभव नहीं था? कृष्ण सिर्फ एक नजर से उन सभी का सफाया कर सकते थे, जो धर्मयुद्ध में उनके विरुद्ध मैदान पर आ धमके थे।   जरा सोचें:  यदि ईश्वर की पूजा-अर्चना ही पर्याप्त है तब बाइबिल क्यों है? कुरान क्यों है? भगवद् गीता क्यों है? किसी धर्मग्रंथ की जरूरत क्यों है? यदि हर रविवार चर्च में जाना और प्रभु ईशु पर भरोसा जताना ही काफी है तो फिर ईशु ने 'क्या करें और क्या नहीं करें' का उपदेश देने में अपने तीन साल क्यों खराब किए, जो बाद में बाइबिल के रूप में ...

बुद्धिमान लोग तलाशते हैं ऐसे काम, जिनसे तनाव दूर हो और कमाई भी हो

बुद्धिमान लोग ऐसी गतिविधियों की तलाश में रहते हैं। उनके लिए ये गतिविधियां दोहरी खुशी लाती हैं। तनाव तो दूर करती ही हैं,  कमाई भी हो जाती है। यानी,  आम के आम,  गुठलियों के दाम।   अगर आप स्कूलों-कॉलेजों पर बारीकी से नजर रखें तो पाएंगे कि शिक्षकों के कुछ पसंदीदा छात्र होते हैं। भले ही वे पढ़ाई-लिखाई में सबसे अच्छे न हों, फिर भी सबके प्रिय होते हैं। आखिर ये कौन छात्र हैं? ये वे छात्र होते हैं, जिनमें नेतृत्व के गुण होते हैं, जो एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में हिस्सा लेते हैं और सभी तरह की सांस्कृतिक गतिविधियों में अपने संस्थान की अगुवाई करते हैं। वे अपने संस्थान के झंडाबरदार होते हैं। कोई शक नहीं कि हर संस्थान ऐसे छात्रों को हमेशा याद करते हैं।   वास्तव में ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। शैक्षणिक संस्थानों द्वारा ऐसे कार्यक्रम आयोजित करना अब सामान्य बात होती जा रही है। यकीनन, यह सकारात्मक संकेत है और उन संस्थानों की तारीफ होनी चाहिए जो ऐसे कार्यक्रम आयोजित कराते हैं। व्यापक नजरिए से देखें तो एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में ड्राम...

अगर ध्यान रखेंगे ये बात तो कभी उदास नहीं होंगे....

व्यक्ति निर्भय हो और उसका मन भीतर से शांत हो तो ऐसे लोग परमात्मा को सरलता से पा सकते हैं। परमात्मा को पाने का यह अर्थ न समझा जाए कि वे व्यक्ति के रूप में साक्षात मिल जाएंगे। परमात्मा को पाने का मामला अनुभूति से जुड़ा है। दुनिया में कई तरह के भय हैं।  धन, प्रतिष्ठा, रिश्ते, सम्मान और अपना शरीर, इन सबके नुकसान का भय मनुष्य को सताता है। आदमी इन्हीं के भय में उलझ जाता है और भूल जाता है कि सबसे बड़ा भय है मृत्यु का भय। जिसने मृत्यु के भय को ठीक से समझ लिया, वह इन भय के टापुओं से मुक्ति पा लेगा। सुंदरकांड में रावण के दरबार में रावण हनुमानजी को मारने का फैसला ले चुका था। जब उसे रोका गया तो उसने पूंछ में आग लगाने का आदेश दे दिया। सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।। यह सुनते ही रावण हंसकर बोला - अच्छा, तो बंदर को अंग-भंग करके भेज दिया जाए। जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउं मैं तिन्ह कै प्रभुताई।  जिनकी इसने बहुत बढ़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता तो देखूं। यहां रावण और हनुमानजी भय और निर्भयता की स्थिति में खड़े हुए हैं। रावण बार-बार इसीलिए हंसता है, क्योंकि वह अपने भय ...

शास्त्रों को समझने के लिए इस नजरिए को अपनाएं....

नई पीढ़ी के बच्चे जब भी कोई ऐसा काम करते हैं, जो पुराने लोग नहीं कर चुके हों या जिन्हें वे पसंद न करते हों ये बुजुर्ग उन्हें समझाने पर तुल जाते हैं। मैंने देखा है कि इसके लिए कई बार पुराने लोग शास्त्रों का सहारा लेते हैं। कहते हैं कि रामायण में यह लिखा है, बाइबल यह कहती है और कुरान में ऐसे समझाया है। ये प्रमाण इन बच्चों को प्रभावित कर दें, जरूरी नहीं है। यह सही है कि ग्रंथ में लिखी बातों के प्रति इस धरती पर असीम श्रद्धा है। लिखने वाले महापुरुषों ने इस देश, काल, परिस्थिति में जो देखा, समझा और अनुभूत किया वही पृष्ठों पर उतर आया।वक्त बदला तो समझ भी बदली। जीवनशैली की आवश्यकताएं वैसी नहीं रही। इसीलिए लोग शास्त्रों के शब्दों के भीतर जीवन उपयोगी बातें ढूंढऩे लगे। शब्दों की भरमार होने के कारण और समय न होने से लोगों ने इस क्रिया को भी छोड़ दिया। फिर आजकल का समय तो ऐसा है कि कागज का प्रमाण सत्य से बहुत दूर हो गया। सभी जानते हैं कि अवकाश लेना हो तो बीमारी का सर्टिफिकेट लगा दो। गलती से डेथ सर्टिफिकेट अगर दे दिया जाए और आदमी जीवित रह जाए तो उसे खुद को जिंदा साबित करना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि ...

खुशहाल गृहस्थ जीवन के लिए याद रखें ग्रंथों की ये छोटी सी बात...

गृहस्थी कौन सी सबसे ज्यादा सुखी मानी जाती है। इस बात को लेकर लंबी बहस हो सकती है लेकिन सच तो यही है कि गृहस्थी वो ही सबसे ज्यादा सुखी है जहां प्रेम, त्याग, समर्पण, संतुष्टि और संस्कार ये पांच तत्व मौजूद हों। इनके बिना दाम्पत्य या गृहस्थी का अस्तित्व ही संभव नहीं है। यदि इन पांच तत्वों में से कोई एक भी अगर नहीं हो तो रिश्ता फिर रिश्ता नहीं रह जाता, महज एक समझौता बन जाता है। गृहस्थी कोई समझौता नहीं हो सकती। इसमें मानवीय भावों की उपस्थिति अनिवार्य है। आइए, भागवत में चलते हैं, देखिए महान राजा हरिश्चंद्र के चरित्र और उनकी पत्नी तारामति के साथ उनके दाम्पत्य को। हरिश्चंद्र अपने सत्य भाषण के कारण प्रसिद्ध थे। वे हमेशा सत्य बोलते थे, उनके इस सत्यव्रत में उनकी पत्नी तारामति भी पूरा सहयोग करती थी। वो ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं होने देती जिससे सत्यव्रत टूटे।  अब आइए, देखें उनके दाम्पत्य में ये पांच तत्व कैसे कार्य कर रहे थे। पहला तत्व प्रेम, हरिश्चंद्र और तारामति के दाम्पत्य का पहला आधार प्रेम था। हरिश्चंद्र, तारामति से इतना प्रेम करते थे कि उन्होंने अपने समकालीन राजाओं की तरह कभी को...