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जानिए, क्यों चुनावी बांड के जरिये राजनीतिक दल चंदा लेना पसंद नहीं कर रहे हैं

राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे को पारदर्शी बनाने और राजनीति में कालेधन के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के इरादे से शुरू किए गए चुनावी बांड की खरीद के आंकड़े यही बयान कर रहे हैं कि उनसे अभीष्ट की पूर्ति शायद ही हो। यह उत्साहजनक नहीं कि चुनावी बांड के जरिये राजनीतिक दलों को चंदा देने का सिलसिला गति पकड़ता नहीं दिख रहा है। अभी तक करीब 470 करोड़ रुपये के कुल 1062 बांडों की ही खरीद हुई है। जब माना यह जा रहा था कि समय के साथ चुनावी बांडों के जरिये चंदा देने की प्रवृत्ति बढ़ेगी तब संकेत यही मिल रहे हैं कि उसमें कमी आ रही है। चुनावी बांड की खरीद के लिए अभी तक चार बार दस-दस दिन की समय अवधि घोषित की जा चुकी है, लेकिन इस दौरान खरीदे गए बांडों की संख्या के साथ उनकी राशि भी घटती दिखी।
पहले चरण यानी मार्च में जहां 222 करोड़ रुपये के 520 बांड बिके वहीं चौथे चरण यानी जुलाई में लगभग 32 करोड़ रुपये के मात्र 82 बांड। यह आंकड़ा तो यही रेखांकित कर रहा है कि लोग चुनावी बांडों से चंदा देने में कतरा रहे हैं। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दल ही इस तरीके से चंदा लेना पसंद नहीं कर रहे हैं। यदि वास्तव में ऐसा है तो फिर यह संदेह स्वाभाविक है कि कहीं पहले की ही तरह गुपचुप तरीके से तो चंदे का लेने-देन नहीं हो रहा है? यदि चंदे के बहाने कालाधन राजनीतिक दलों के पास अभी भी पहुंच रहा है तो इसका मतलब है कि वह उद्देश्य पूरा नहीं होने वाला जिसके लिए चुनावी बांड योजना शुरू की गई थी।
इस पर गौर किया जाना चाहिए कि एक हजार और दस हजार रुपये वाले चुनावी बांडों की खरीद न के बराबर है। ज्यादातर बांड दस लाख या एक करोड़ रुपये वाले हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि इस वर्ष मार्च से लेकर अब तक राजनीतिक दलों को मिले चंदे का विवरण सामने लाया जाए। यदि यह प्रकट होता है कि राजनीतिक दलों को चुनावी बांडों के मुकाबले फुटकर राशि के जरिये अधिक चंदा मिला तो इससे इसी बात की पुष्टि होगी कि कालाधन राजनीति में खप रहा है।
पहले राजनीतिक दलों को 20 हजार या इससे कम राशि के चंदे का विवरण नहीं देना होता था। इसके चलते वे यही दिखाते थे उन्हें एक बड़ी राशि फुटकर चंदे से मिली। चुनावी बांड जारी होने के साथ ही फुटकर राशि से मिलने वाले चंदे की सीमा दो हजार रुपये कर दी गई। जब ऐसा किया गया तभी यह सवाल उठा था कि राजनीतिक दल जैसा दावा 20 हजार रुपये से कम राशि वाले चंदे को लेकर करते थे वैसा ही दो हजार रुपये को लेकर भी कर सकते हैं, लेकिन पता नहीं क्यों उस पर ध्यान नहीं दिया गया? अब जरूरी केवल यह नहीं कि उन कारणों की छानबीन की जाए जिनके चलते चुनावी बांड के जरिये चंदा देने में अरुचि दिखाई जा रही है, बल्कि राजनीति में कालेधन के प्रवेश के अंदेशे को दूर भी किया जाए।

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