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क्या है पेट्रोल-डीज़ल की चढ़ती कीमतों के पीछे का झूठ???

‘सेमल वृक्ष कितना बड़ा क्यों न हो, उससे हाथी नहीं बांधा जा सकता।’ -  नीतिशास्त्र ‘सरकार का सत्तावृक्ष कितने ही बड़े बहुमत से क्यों न हो, उसे नागरिकों का हित नहीं बांध सकता।’ - राजनीतिशास्त्र हम वर्षों से यह झूठ सुनते आ रहे हैं। सहन करते आ रहे हैं।  मानते जा रहे हैं। किन्तु अब नहीं। क्योंकि, पहले हम विवश थे। लागत से भी कम मूल्य पर खरीदने वाले, किसी भी तरह की शिकायत नहीं कर सकते। तब हमें पेट्रोल हो या डीज़ल, सब कुछ कम कीमत पर मिलता था - यानी मूल कीमत का बोझ सरकार उठाती थी। जिसे सब्सिडी कहते हैं। यानी ‘राज सहायता’। बड़ा सामंती सा नाम! अब नहीं। क्योंकि अब न तो पेट्रोल पर राज सहायता है, न ही डीज़ल पर। तो हम साधारण नागरिकों का पूर्ण अधिकार है कि पूर्ण सत्य जानें। ताकि असत्य सामने आ सके। पहला अर्धसत्य है - कि सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती। क्योंकि हमारे यहां सबकुछ अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल (क्रूड) की कीमतों से तय होता है। जो अचानक बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल तक चली गई। पूर्ण सत्य यह है कि सरकार ही सबकुछ कर सकती है। पलक झपकते सरकार कीमतें कम कर सकती है। सर्वाधिक आसान उपाय है - सेंट्रल एक्सा...

किसान सरकारों को बोझ क्यूँ लगते हैं ?

किसी भी देश की तरक्की का रास्ता खेत -खलिहानो से होकर जाता है।  हमारे देश में सबसे दयनीय हालत किसान की  है। वो किसान जो संसार का पेट भरता है आज खुद भूखा रहने पर मजबूर है। कभी मौसम की मार, कभी समय पर बिजली-पानी का न मिल पाना, कर्ज के बोझ तले दबा हुआ। फटे हाल उम्मीद की नज़रों से देखता हुआ लेकिन जो आता है इस्तेमाल करके चला जाता है। ऐसी हालत क्यूँ हुई किसान की ? कभी कोई नहीं सोचता।  क्यों ? क्यूंकि इनसे पार्टी फण्ड के नाम पर कभी किसी को पैसा नहीं मिलता। नेताओं की झोली नहीं भरती। पिछले तीन सालों में हमारे देश तमाम राज्य सरकारों ने 17लाख करोड़ रु संघठित क्षेत्र में टैक्स माफ़ी के रूप में दे दिया जबकि किसानो को यदि सम्पूर्ण कर्ज माफ़ी दी जाय तो भी 12. 6 लाख करोड़ रु का खर्च आएगा। लेकिन १२. ६ लाख करोड़ के लिए सोचना पड़ेगा की इतना पैसा आएगा कहाँ से ? सारे नेतागण बोल उठेंगे कि ये हो जायेगा वो हो जायेगा। कथित अर्थशास्त्री अपने वातानुकूलित कमरों में बैठ कर किसान की लागत का आंकलन करते है। SBI के अधिकारी फण्ड की कमी का रोना रोते हैं। पर इस पर ध्यान कोई भी जानबूझकर नहीं देना चाहता कि हमने ...

भारतीय मुस्लिमों को पाकिस्तानी कहना अपराध तो उनका क्या जो कहते हैं- पाकिस्तान जिंदाबाद

एआइएमआइएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी अपने विवादित बयानों के कारण हमेशा चर्चा में रहते हैं। प् हले वह लोकसभा में अपने एक विवादित वक्तव्य के कारण चर्चा में रहे। उनके अनुसार, ‘भारत में रहने वाले मुसलमानों ने जिन्ना के विचारों (दो राष्ट्र सिद्धांत) को खारिज कर दिया था। ऐसे में जो लोग भारतीय मुस्लिमों को आज भी ‘पाकिस्तानी’ कहकर बुलाते हैं, उन्हें गैर- जमानती कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए।’ देश के मुसलमानों के संदर्भ में जो कुछ ओवैसी ने कहा वह पूरा सच नहीं है। नि:संदेह, किसी भी भारतीय को ‘पाकिस्तानी’ कहना उसे कलंकित करने जैसा है। उसका एक स्पष्ट कारण भी है। उनका ताजा विवादित बयान यह था कि जम्मू के सुंजवां में आंतकी हमले में जिन पांच कश्मीरी मुसलमानों ने अपना बलिदान दिया है उनके बारे में बात क्यों नहीं हो रही है? देश के मुसलमानों के संदर्भ में जो कुछ ओवैसी ने कहा वह पूरा सच नहीं है। नि:संदेह, किसी भी भारतीय को ‘पाकिस्तानी’ कहना उसे कलंकित करने जैसा है। उसका एक स्पष्ट कारण भी है। पाकिस्तान अपने जन्म से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर भारत से युद्ध कर रहा है। हर दूसरे दिन सीमापार से होने वाले आतंकवा...

जो लोग राम मंदिर को तोड़ने के लिए बाबर को दोषी नहीं मानते उन्हें बाबरनामा जरूर पढ़ना चाहिए

हमारे देश में एक बहस छिड़ी हुई है कि राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गयी। एक तबका कहता है कि राम मंदिर को बाबर ने तुडबाया और वहां पर मस्जिद का निर्माण करवाया और दूसरा कथित सेक्युलर वादी जिसे इतिहास को अपने हिसाब से पेश करने में ज्यादा आनंद आता है कहता है बाबर तो सहिषुण था बाबरी मस्जिद का निर्माण उसने नहीं करवाया। अभी कोई बाबर के वंशज भी बोल रहा था कि बाबर ने राममंदिर का का विध्वंस किया होतो में माफ़ी मांगने को तैयार हूँ।     मैं ऐसे लोगों को कहूंगा की भ्रमित लोगो बाबर नामा पढ़ो जिससे तुम बाबर की राय जान सको हिंदुस्तान के बारे में। जो खुद बाबर ने लिखा है। शायद उनकी राय बदल जाये ? दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जिसका कोई अतीत न हो अतीत अच्छा या बुरा दोनों प्रकार का हो सकता है। इतिहास तो इतिहास होता है उसमे अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता। शायद भारत ही ऐसा देश जहाँ इतिहास को तोड़ मरोड़कर अपने सुविधा जनक तरीके से पेश किया जाता है।  प्राचीन भारत के सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक इतिहास को गलत तरीके से पेश करने और विधि, राजनीति एवं विज्ञान के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों ...

न्यूनतम समर्थन मूल्य की जटिल गुत्थी, क्या किसानों को मिलेगा फायदा

दो दशक पहले भारत में एक महान अक्रांति की शुरुआत हुई जिसे हम नई अर्थव्यवस्था कहते हैं। पांच फीसदी के आंकडे़ पर ही ठिठकी विकास दर को रफ्तार देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश और सरकारी लाइसेंस कोटा परमिट राज की जकड़बंदी खत्म करने की घोषणा को बीसवीं सदी की सबसे अहम घटना माना गया। यह तब भी नजरअंदाज किया गया कि दल बदलने में माहिर भ्रष्ट भारतीय नेता और नौकरशाही सरकारी ताकत के मूल और चुनावी चंदे के अक्षय पात्र, लाइसेंस कोटा परमिट राज को त्यागने की तनिक भी उतावली न दिखाएंगे। अब तक सरकारें भले ही बदली हों, राज्यों में किसानी से शिक्षा तक की सारी राजकीय या निजी संस्थाओं में पुराने बिचौलियों की ही धमक कायम है। नई अर्थव्यवस्था का घोषित दर्शन यह था कि सरकारी नियम पारदर्शी होंगे तो भ्रष्टाचार कम होगा, मेहनती को मौका मिलेगा, नए उद्योग खुलेंगे, रोजगार बढ़ेंगे और फर्श से अर्श पर जा पहुंचे सफल नए कार्पोरेट्स उन ग्रामीण गरीबों के हक में अपना सामाजिक उत्तरदायित्व जरूर निभाएंगे जिनके बीच से वे आए हैं। 19वीं सदी में अमेरिका और यूरोप में यही हुआ। भारतीय परिदृश्य में खेती अब भी अहम आज निजी क्षेत्र म...

जय जवान जय किसान !,:कश्मीर के 16 वर्षीय युवाओं के आतंकी बनने का आधा सच

आतंक से भी अधिक विकृत होता है झूठ।' - अज्ञात कश्मीर से झूठ ही सामने आते हैं। सभ्य भाषा में आधा सच कहना बेहतर होगा। ताजे आधे सच डरावने हैं। पहला है 16 वर्षीय फरदीन का। उसने सेंट्रल रिजर्व पोलिस फोर्स(सीआरपीएफ) कैम्प पर आत्मघाती हमला किया। पांच जवान शहीद। और भारी चर्चा में आ गया। कि कश्मीर में "होमग्रोन" टेरर बढ़ गया है। बच्चे-युवा इस्लाम को खतरे में देख, बम बांधकर खुद मरने और मारने को तत्पर हो रहे हैं। सेना व अर्धसैनिक बलों के "अत्याचार" के विरूद्ध नौजवान खड़े हो रहे हैं। दूसरा सच है- आतंक को फलने-फूलने, फैलाने के लिए पैसा लगाने वालों के खिलाफ चार्जशीट। टेरर फंडिंग की इस कानूनी कार्रवाई में पाकिस्तान और उससे पैसे लेकर आतंक चलाने वाले हाफिज सईद और सैयद सलाउद्दीन नामक दो अपराधियों के नाम हैं। साथ ही कश्मीरी अलगाववादी हुर्रियत के कई नेताओं के। दोनों आधे सच, वास्तव में एक-दूजे से जुड़े हुए हैं। और मिलाकर पूरा, बड़ा झूठ सामने लाते हैं। देखिए, कैसे? पहले फरदीन या 16-18 की उम्र के कश्मीरियों के अातंक के प्रति बढ़ते रुझान का सच। फरदीन मोहम्मद खंडे चर्चा में इसल...

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? चरखे से आजादी कैसे ?

इतिहास से छेड़छाड़ क्यों? : दोस्तों हम बचपन से सुनते और पढ़ते आ रहे हैं कि आजादी एक परिवार के बलिदान और त्याग की वजह से और गाँधी जी की सीखों से आयी है। जिसका प्रमाण हमें नौ लाख योजना और इमारतें  जो एक परिवार के नाम पर चल रही हैं, हिंदुस्तान में लगभग सत्तर से अस्सी हज़ार ऐसी सड़कें हैं जो एक परिवार  नाम पर हैं। क्यों ? कितने चढ़े फांसी पर और  कितनो ने गोली खायी थी , क्यूँ झूट  साहब कि  चरखे से आजादी आयी थी।  हिंदुस्तान के इतिहास का दुर्भाग्य है कि उसको तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है। हमने सिकंदर को विश्व विजेता बता दिया और महाराज पुरु को भुला दिया जबकि यूरोपियन इतिहास में स्पष्ट है सिकंदर हिंदुस्तान से हार कर गया था। हमने अकबर को महान बना दिया परन्तु महाराणा प्रताप को........? हमने कालू बाल्मीकि के बलिदान को जाति के जहर में घोल कर भुला दिया। ऐसे तमाम उदाहरण मिलेंगे आपको।  ऐसे ही हमने या हमारे देश के इतिहास लेखकों ने या चाटुकार लेखकों ने इतिहास लिखने में चाटुकारिता दिखाई है वो किसी भी तरह से तथ्यों पर खरी नहीं उतरती है।  मैं आभारी हूँ गाँधी जी की...