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"गाय की दुर्दशा"

"गौ माता"   ये वो शब्द हैं जिनमें गाय के लिए सम्मान दिखाई देता है.  परन्तु क्या ये शब्द बोलने से या लिखने से ही हम गाय को सम्मान दे रहे हैं?  गौ रक्षा के लिए तमाम संस्थाएँ काम कर रही हैं। जिनका काम गौ को तस्करों से बचाना है और सुरक्षित गौशालाओं तक पहुँचाना है. जो शायद अपना काम कर भी रही हैं। परन्तु क्या गौ माता  पर केवल तस्करों का ही खतरा है ? 'नहीं' गौ माता को तस्करों से इतना खतरा नहीं है जितना खतरा हमारी कृतघ्ना से है।  जिस दिन हम गौ माता के उपकारों की क़द्र करना शुरू कर देंगे उसी दिन गौ माता की सुरक्षा के लिए न किसी गौ रक्षा दल की जरुरत पड़ेगी और न ही किसी गौशाला की। लेकिन हम इतने कृतघ्न हो गए हैं जब जन्म देने वाली माँ का उपकार नहीं मानते तो गौ माता का उपकार कैसे मान सकते हैं ? जब मशीन नहीं होती थी तो गौ पुत्र ही थे जो हमारे मददगार थे मशीन आते ही हम  भूल गए। और छोड़ दिया आवारा नाम मिला सांड।  अरे यार तुमने भी दूध पिया है उसकी माँ का इस नाते रिश्ता भी बनता है। दूध पिया जब दूध  देना बंद कर दिया तो खाना देना ही बंद कर दिया। फिर भगा दिया द...

मोदी जी, देश के प्रधानमन्त्री के तौर पर ऐसी बातें आपको शोभा नहीं देतीं

गजब चल रहा है साब! आदमी प्रधानमंत्री है. उसे मालूम चलता है कि एक दुश्मन देश का एक ‘नीच आदमी’ आकर विपक्षियों के साथ बैठकर मीटिंग कर रहा है और ये उस बात को रैली में जाकर, दुनिया को ...

किसान का श्रमजल

एक बार भगवान बुद्ध राजगृह में थे। जनसमूह को नित्य प्रवचन देने के उपरांत सायंकाल बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठकर विभिन्न विषयों पर वार्तालाप किया करते थे। ऐसा करने से शिष्यों का भी ज्ञानवर्धन होता था और बुद्ध को उन सभी का तुलनात्मक बौद्धिक स्तर भी ज्ञात हो जाता था। एक दिन बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे बातचीत कर रहे थे। अचानक उन्होंने एक प्रश्न उठाया- तुममें से कोई यह बता सकता है कि सबसे उत्तम जल कौन सा है? एक शिष्य ने तत्काल उत्तर दिया-गंगाजल। बुद्ध ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाया। दूसरे शिष्य ने कहा- जमीन पर गिरने से पहले का वर्षाजल। बुद्ध इससे भी असहमत थे। तीसरे शिष्य का विचार था उषाकाल की किरणों में चमकता ओसजल।  बुद्ध इस बार भी संतुष्ट नहीं हुए। चौथे शिष्य की दृष्टि में बिछुड़े हुए बेटे से मिलने पर मां की आंखों में आया अश्रुजल सबसे उत्तम जल था तो पांचवें शिष्य के अनुसार फरेब से इकट्ठे धन को देखकर मरणासन्न धनी की आंखों से पश्चाताप स्वरूप निकलने वाले आंसू से बेहतर कोई जल न था। बुद्ध फिर बोले- नहीं, इससे कहीं अधिक वंदनीय व पवित्र जल भी है? काफी देर से मौन बैठे शिष्य आनंद...

गिरती मानसिकता, घटता राष्ट्रप्रेम

मित्रो, पिछले कुछ समय से एक ट्रेंड सा चल निकला है कि कुछ लोग अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. जैसे अशहिषुणता, गोकशी, बीफ आदि मुद्दे, जो बहुत चर्चा में रहे और लोगो ने इन्हें भुनाने की पूरी कोशिश की. हम इसे छोड़ देते हैं ये सब भूतकाल की बात सोचकर भुला देते हैं. परन्तु अब जो जवाहर लाल विश्व विद्यालय का प्रकरण है इसने तो अंदर से हिलाकर रख दिया है हर भारतवासी को, सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारे देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं हमारे माननीय नेता? हम सबकी सोच अलग हो सकती है परन्तु हम अपनी सीमा का ज्ञान तो रखेंगे ही? हम अपनी माँ को माँ ही कहेंगे? JNU  में जो कुछ किया तथाकथित छात्रों ने वो एक अपराध है ये सब जानते हैं परन्तु हमारे माननीय नेताओं ने जो किया उसे क्या कहें ? इन नेताओं में कोई नया नहीं था, कुछ तो ऐसे थे जो वर्तमान में संवैधानिक पदो पर आसीन हैं और कुछ अपने आपको भविष्य का प्रधानमंत्री दिखाने में लगे हुए हैं. चलो अब एक नजर JNU  प्रकरण पर डालते हैं, वहां पर 9 फ़रवरी को अफजल गुरु की वरसी पर एक कार्यक्रम होता है बिना यूनिवर्सिटी प्रशाशन की अनुमति के और वहां पर ...

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Pani Bharne mast Haryanvi

छोटी राजनीति, दोगलापन या देशद्रोह

याकूब मेमन को फांसी दे दी गयी जो एक ऐतिहासिक फैसला है, परन्तु इस घटना का जिस तरह से राजनीतिकरण हो रहा है वो बहुत ही दुखद है, हम किसी भी तरह से किसी की मृत्यु को सही नही ठहरा सकते वो भी उसके मरने के बाद, परन्तु याकूब जैसे लोगो के लिए हम उनके जीवित रहने को सही नही कह सकते। जिस तरह से इस मृत्यु दंड के फैसले का मजाक बनाया गया या यूँ कहा जाये हमारे कानून के घुमाव दार पैंतरों इस्तेमाल हमारे प्रबुद्ध वकीलों के द्वारा याकूब को बचाने में किया गया वो हमारे समाज को सोचने पर मजबूर कर देता है, क्या यही हैं हमारे कानून के रखवाले, सताए हुओं को न्याय दिलाने वाले? हम यहाँ मृत्यु दंड को जायज नहीं ठहरा रहे परन्तु जो हमारे महानुभावों ने किया उसका विरोध जरूर कर रहे हैं. इस फैसले का पूरे २२ साल तक इंतज़ार किया हमारे देश की जनता ने क्यों? क्या इसी दिन के लिए  निसंदेह , नही. हमने इंतज़ार किया  क्यूंकि याकूब परिवार और दाऊद की वजह से २५७ निर्दोष लोग मारे गए, बहुत से लोग घायल हुए, किसी ने माँ को खोया और किसी ने बेटे को. किसी परिवार का कमाने वाला चला गया  वो परिवार सड़क पर गया भूखा मरने के लिये… ह...