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कार्य और बेगार

एक बूढ़ा कारपेंटर अपने काम के लिए काफी जाना जाता था , उसके बनाये लकड़ी के घर दूर -दूर तक प्रसिद्द थे . पर अब बूढा हो जाने के कारण उसने सोचा कि बा की की ज़िन्दगी आराम से गुजारी जाए और वह अगले दिन सुबह-सुबह अपने मालिक के पास पहुंचा और बोला , ” ठेकेदार साहब , मैंने बरसों आपकी सेवा की है पर अब मैं बाकी का समय आराम से पूजा-पाठ में बिताना चाहता हूँ , कृपया मुझे काम छोड़ने की अनुमति दें . “ ठेकेदार कारपेंटर को बहुत मानता था , इसलिए उसे ये सुनकर थोडा दुःख हुआ पर वो कारपेंटर को निराश नहीं करना चाहता था , उसने कहा , ” आप यहाँ के सबसे अनुभवी व्यक्ति हैं , आपकी कमी यहाँ कोई नहीं पूरी कर पायेगा लेकिन मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि जाने से पहले एक आखिरी काम करते जाइये .” “जी , क्या काम करना है ?” , कारपेंटर ने पूछा . “मैं चाहता हूँ कि आप जाते -जाते हमारे लिए एक और लकड़ी का घर तैयार कर दीजिये .” , ठेकेदार घर बनाने के लिए ज़रूरी पैसे देते हुए बोला . कारपेंटर इस काम के लिए तैयार हो गया . उसने अगले दिन से ही घर बनाना शुरू कर दिया , पर ये जान कर कि ये उसका आखिरी काम है और इसके बाद उसे और कुछ नहीं करना होगा...

गांधी मात्र एक राजनैतिक मजबूरी का नाम

आज के संदर्भ में गांधी मात्र एक राजनैतिक मजबूरी का नाम है। आज स्थिति यह है कि भगवान को नकारा जा सकता है लेकिन गांधी को नहीं। मान लें कि pk फिल्म में शिव के स्थान पर कलाकार गांधी के रूप में होता और नायक के मन में यह बात होती कि गांधी ने आजादी दिलाई और मेरा रिमोट भी यही दिलाएंगे (सत्याग्रह से) तो कैसा दृश्य होता। फिल्म बोर्ड तक पास नहीं करता वह दृश्य। सारे काग्रेसी गांधी और गोडसे को लेकर अति असहिष्णु हैं। इस त्थ्य पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता कि गांधी के उभरने से अंग्रेजों को ह िन्दु-मुसलमान के बीच की खाई को चौड़ा करने वाला एक औजार मिल गया और तुष्टीकरण की नीति की नींव पड़ी। वास्तव में संघ की असली देन यह है कि इसने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना को संवैधानिक ढांचे भीतर पोषित किया और मरने नहीं दिया। दिशाहीन अतिवादी हिन्दु जो भी संघ से जुड़े (उन्हें संघ ही सबसे करीब वैचारिक संगठन लगा) उनकी अतिवादी धार को संघ ने कुंद कर दिया जिससे वे लोकतांत्रिक रास्ते पर चल कर अपने ध्येय को पहचान पाए (सेकुलर उकसाहटों के बावजूद)। जहां तक मानवीय मूल्यों का प्रश्न है, गांधी से कोई मतभेद का सवाल नहीं, वे गांधी...

दाऊद इब्राहीम तस्कर है या आतंकवादी ?

दाऊद इब्राहीम तस्कर है या आतंकवादी ? दो दिन पहले कोस्ट गार्ड के कमांडो ने समंदर में तस्कर मारे थे या आतंकवादी ? इस घटना को किस चश्मे से देखें ? धर्म निरपेक्षता के चश्मे से या साम्प्रदायिकता के चश्मे से ? इस पर अमित शाह की बात माने या अजय माकन की ? इस मसले पर इंडियन एक्सप्रेस की खबर पढ़े या इंडिया टीवी को सुने ? .............................................................................................. ये हाल है उस देश का जहाँ इतिहास के दो सबसे बड़े आतंकी हमले समंदर के रास्ते से किये गये हैं. 1993 के मुंबई सीरियल धमाकों में गोला बारूद कराची से समंदर के रास्ते नाव पर लाया गया था. इन धमाकों में हमारे देश के 350 लोग मारे गये और 1200 घायल हुए. 2008 में फिर मुंबई में आतंकी हमला हुआ जिसमे 164 लोग मारे गये और 308 घायल हुए.इस हमले में भी गोला बारूद कराची से समंदर के रास्ते आया था. आतंक के इसी रास्ते पर कोस्ट गार्ड को दो दिन पहले एक संदिग्ध नाव दिखी थी जिसके इंटरसेप्ट ख़ुफ़िया एजेंसियों ने पकडे थे. क्या उस नाव को रोकना चाहिय था ? सच ये है कि मुंबई धमाकों के 21 साल बाद ...पहली बार देश की तटीय...

लकड़ी का कटोरा

एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु – बेटे के यहाँ शहर रहने गया . उम्र के इस पड़ाव पर वह अत्यंत कमजोर हो चुका था , उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम देता था . वो एक छोटे से घर में रहते थे , पूरा परिवार और उसका चार वर्षीया पोता एक साथ डिनर टेबल पर खाना खाते थे . लेकिन वृद्ध होने के कारण उस व्यक्ति को खाने में बड़ी दिक्कत होती थी . कभी मटर के दाने उसकी चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाँथ से  दूध छलक कर मेजपोश पर गिर जाता . बहु -बेटे एक -दो दिन ये सब सहन करते रहे पर अब उन्हें अपने पिता की इस काम से चिढ होने लगी . “ हमें इनका कुछ करना पड़ेगा ”, लड़के ने कहा . बहु ने भी हाँ में हाँ मिलाई और बोली ,” आखिर कब तक हम इनकी वजह से अपने खाने का मजा किरकिरा रहेंगे , और हम इस तरह चीजों का नुक्सान होते हुए भी नहीं देख सकते .” अगले दिन जब खाने का वक़्त हुआ तो बेटे ने एक पुरानी मेज को कमरे के कोने में लगा दिया , अब बूढ़े पिता को वहीँ अकेले बैठ कर अपना भोजन करना था . यहाँ तक की उनके खाने के बर्तनों की जगह एक लकड़ी का कटोरा दे दिया गया था , ताकि अब और बर्तन ना टूट -फूट सकें . बाकी लोग पहले की ...

बाड़े की कील

बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आप खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि , ” अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना.” पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी.पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें  ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना आपा नही खोया जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि ,” अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना.” लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़...

केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा

केरल से करगिल घाटी तक गौहाटी से चौपाटी तक सारा देश हमारा जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा – केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा, जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा – केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा, घायल अपना ताजमहल है, घायल गंगा मैया टूट रहे हैं तूफ़ानों में नैया और खिवैया तुम नैया के पाल बदल दो तूफ़ानों की चाल बदल दो हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा – केरल से करगिल घाटी तक सार ा देश हमारा, कहीं तुम्हें परबत लड़वा दे, कहीं लड़ा दे पानी भाषा के नारों में गुप्त है, मन की मीठी बानी आग लगा दो इन नारों में इज़्ज़त आ गई बाज़ारों में कब जागेंगे सोये सूरज! कब होगा उजियारा जीना हो तो मरना सीखो, गूँज उठे यह नारा – केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा संकट अपना बाल सखा है, इसको कठ लगाओ क्या बैठे हो न्यारे-न्यारे मिल कर बोझ उठाओ भाग्य भरोसा कायरता है कर्मठ देश कहाँ मरता है? सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुँकारा जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा

कांग्रेस के हिसाब से आतंकी नहीं थे बोट में, स्मगलर्स थे !!

बेचारे.. मासूम! भारत के लिए तोहफे में अमन के कबूतर लेकर पाकिस्तान से चले होंगे ? वहीं दिमागी दिवालियेपन की दौड़ में सबको पछाड़ते हुए 'पत्रकार' प्रवीण स्वामी अपने 'गुप्त सूत्रों' के हवाले से बोट के अस्तित्व को ही ख़ारिज कर चुके हैं !!! (हालांकि प्रवीण के ये 'सूत्र' इतने गुप्त हैं कि उन्हें खुद ही इन सूत्रों का कोई अता-पता नहीं है !) हो सकता है कि कल को हमारे (अ)प्रिय राजकुमार हीरानी-आमिर खान अपनी लिजलिजी भावुकता के ड्रम उ लटते हुए यह बताएं कि उस बोट में कोई सलोना 'सर्फराज़', अंधविश्वासी और धूर्त भारतीयों की गिरफ्त में फंसी अपनी जग्गू को छुड़ाने आ रहा था और भारत के 'सांप्रदायिक' तट रक्षकों ने उसे बेरहमी से ख़त्म कर डाला !!! और मैं हैरान हूँ. आखिर अपने छटांक भर दिमाग में बेशर्मी का अंतहीन भंडार कैसे जमा कर लेते हैं ये लोग??