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मीडिया का दोगला पन…

मैं आज यहाँ जो लिखने जा रहा हूँ, हो सकता है कुछ लोगों की राय इससे भिन्न हो, पर बात बिलकुल सही है, आपने देखा होगा और शायद किया भी हो, हमारे देश में जब भी कोई बुरी घटना घटती है, तो अखवार और टीवी वाले समाज को कोसते हैं, कि क्या हो रहा है है देश में, जैसे अभी दो या तीन दिन पुरानी बात है , कर्नाटका के बंगलुरु में कुछ मनचलों ने कुछ महिलाओं को बुरी तरह से परेशान किया दुसरे सब्दों में छेड़ा , वो महिलाऐं बेचारी अपनी कार के अंदर छुप गयी और दरवाजे और खिड़की बंद कर ली, उन बदमाशों ने फिर भी उनका पीछा नहीं छोड़ा तो वो सहायता के चिल्लाने लगीं, लोगों का ध्यान उनकी तरफ नहीं गया, जबकि एक सभ्य नागरिक का कर्तब्य है की यदि बच्चे, बुड्ढे या महिलाओं पर अत्याचार हो रहा हो तो उसको अपने प्राणों से बढ़कर इनकी रक्षा करनी चाहिए। पर ऐसा हुआ नहीं, उल्टा लोग हँसतेhue गुज़र रहे थे. जो कि बहुत ही लज्जात्मक है। इस बात को हमारे अखवार और टीवी वाले बंधुओं ने पूरी तन्मयता से उठाया, जो की अच्छे नागरिक का कर्तब्य भी है, ऐसा देखकर अच्छा लगा, अब इन्ही अखवार और टीवी वालों ने एक दूसरी घटना को भी बहुत बढ़चढ़ कर दिखया जो कि उत्तर प्र...

अगर ध्यान रखेंगे ये बात तो कभी उदास नहीं होंगे....

 व्यक्ति निर्भय हो और उसका मन भीतर से शांत हो तो ऐसे लोग परमात्मा को सरलता से पा सकते हैं। परमात्मा को पाने का यह अर्थ न समझा जाए कि वे व्यक्ति के रूप में साक्षात मिल जाएंगे। परमात्मा को पाने का मामला अनुभूति से जुड़ा है। दुनिया में कई तरह के भय हैं।  धन, प्रतिष्ठा, रिश्ते, सम्मान और अपना शरीर, इन सबके नुकसान का भय मनुष्य को सताता है। आदमी इन्हीं के भय में उलझ जाता है और भूल जाता है कि सबसे बड़ा भय है मृत्यु का भय। जिसने मृत्यु के भय को ठीक से समझ लिया, वह इन भय के टापुओं से मुक्ति पा लेगा। सुंदरकांड में रावण के दरबार में रावण हनुमानजी को मारने का फैसला ले चुका था। जब उसे रोका गया तो उसने पूंछ में आग लगाने का आदेश दे दिया। सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।। यह सुनते ही रावण हंसकर बोला - अच्छा, तो बंदर को अंग-भंग करके भेज दिया जाए। जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखउं मैं तिन्ह कै प्रभुताई।  जिनकी इसने बहुत बढ़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता तो देखूं। यहां रावण और हनुमानजी भय और निर्भयता की स्थिति में खड़े हुए हैं। रावण बार-बार इसीलिए हंसता है, क्योंकि वह अप...

ये बातें ध्यान रखेंगे तो बन सकते हैं सबके चहेते और प्रिय

सालों पहले एक महान कलाकार को एक कैथेड्रल की दीवार पर भित्तिचित्र बनाने का काम सौंपा गया था। पेंटिंग का विषय था- 'क्राइस्ट का जीवन।’ उन्हें मॉडल ढूंढने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। खासकर क्राइस्ट और उन्हें धोखा देने वाले जूडास का मॉडल तलाशने में।   एक दिन शहर के पुराने इलाके में टहलते हुए उनका सामना बच्चों के एक समूह से हुआ। उनमें से एक 12 साल के बच्चे का चेहरा कलाकार को अच्छा लगा। उन्हें वह चेहरा बिल्कुल किसी एंजिल की तरह लगा। बहुत ही गंदा, लेकिन उन्हें इसी चेहरे की तो तलाश थी। उन्हें क्राइस्ट बच्चे का मॉडल मिल गया था। क्राइस्ट बच्चे का चित्र बनने तक वह बच्चा रोज-रोज बेहद संयम के साथ बैठता।   पेंटर को जूडा के मॉडल के तौर पर कोई नहीं मिला। कई वर्षों बाद भी उन्हें यह ही डर सता रहा था कि उनका मास्टरपीस अभी तैयार नहीं हुआ है। उन्होंने अपनी खोज जारी रखी। उन्हें ऐसा चेहरा कहीं नहीं मिला, जिसे जूडा के तौर पर वह पेश कर सके। उन्हें ऐसा चेहरा चाहिए था जिस पर पूरी तरह हवस और लालच दिखाई दें।   एक दिन पेंटर अपने वरांडे में बैठा चाय पी रहा था। एक जीर्ण-शीर्ण सी छव...

नौकरी में प्रमोशन और नई जिम्मेदारी चाहिए तो ध्यान रखें ये बातें भी

हैरानी की बात है कि लोग 'मैं नहीं जानता’ ये तीन शब्द बोलने से घबराते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से लोग उन्हें अज्ञानी मान लेंगे। वह यह नहीं समझ पाते कि किसी एक विषय पर अनभिज्ञता स्वीकार न करके अपनी पूरी जानकारी को ही संदेह के दायरे में ला रहे हैं।   कुछ ही माह के बाद अप्रैल का महीन आ जाएगा...। प्रोफेशनल लोगों के लिए यह वक्त मूल्यांकन और आत्मावलोकन का होता है। समीक्षा का होता है। पीछे मुड़कर यह देखने का होता है कि हमने करियर की शुरुआत कहां से की थी। अब कहां हैं और भविष्य में कहां हो सकते हैं। हर प्रोफेशनल व्यक्ति इस दौर से गुजरता है। हालांकि, हैरान करने वाली हकीकत यह है कि समान पृष्ठभूमि और क्षमता के साथ शुरुआत करने के बावजूद कुछ सालों बाद एक व्यक्ति शीर्ष और दूसरा निचले पायदान पर रह जाता है।   वे व्यक्ति जो अपनी क्षमताओं का कभी-कभी उपयोग करते हैं, वे शीर्ष पर नहीं पहुंचते। जो व्यक्ति शीर्ष पर पहुंचते हैं वे अपनी क्षमताओं के साथ दूसरी खूबियों को भी मिला देते हैं, जैसे-यह जानना कि लोग उसके काम को कैसे आंकते रहे हैं और कॉरपोरेट जगत कैसे काम करता है। ऐसे व्यक्ति सिर...

ग्रंथों से, ये हैं वो 5 चीजें जो किसी को भी ताकतवर बना सकती हैं

विदुर एक नीतिज्ञ के रूप में विख्यात हैं।  वे महाभारत का एक जाना माना चरित्र हैं, उन्हें कौरवों और पांडवों के काका व पाण्डु के भाई के रूप में भी जाना जाता है। उनका जन्म एक दासी के गर्भ से हुआ था। विदुर धृतराष्ट्र के मन्त्री, लेकिन न्यायप्रियता के कारण पाण्डवों के हितैषी थे। विदुर के ही प्रयत्नों से पाण्डव लाक्षागृह में जलने से बचे थे। युद्ध को रोकने के लिए विदुर ने यत्न किए, लेकिन असफल रहे। इनकी प्रसिद्ध रचना विदुर नीति के अन्तर्गत नीति सिद्धान्तों का सुन्दर निरूपण हुआ है। आज हम आपको बता रहे हैं धर्मराज कहे जाने वाले विदुर की कुछ खास नीतियां जो किसी को भी ताकतवर बना सकती हैं। विदुर नीति के मुताबिक- बलं पंचविधं नित्यं पुरुषाणां निबोध मे। यत्तु बाहुबलं नाम कनिष्ठं बलमुच्यते।। इस श्लोक के मुताबिक इंसान के लिए जरूरी पहली शक्ति बाहुबल होती है। जानिए इसका अर्थ- बाहुबल- शारीरिक ताकत यानी शरीर हष्टपुष्ट और स्वस्थ रखना। इसे कनिष्ठ बल भी कहा गया है। हर रोज योग या कसरत के उपायों से शरीर व मन को तंदुरुस्त रखें। अमात्यलाभो भद्रं ते द्वितीयं बलमुच्यते। तृतीयं धनलाभं तु बलमहुर्...
बात 1962 की है, जब दारा सिंह के कदम रांची की सरजमीं पर पड़े थे. सिडनी के किंग कांग ने दारा सिंह को कुश्ती लडऩे की चुनौती दी थी. हिन्दुतान के दारा सिंह ने उस 200 किलो के किंग कोंग की चुनौती को स्वीकार कर लिया था.... अब्दुर बारी पार्क में कुश्ती होना तय हुआ और ये कुश्ती होने से पहले ही सनसनी छा गयी .. नवंबर 1962 में दुनियाभर के पहलवान रांची में जुटे थे. उस वक्त सिटी में दारा सिंह की जिन-जिन पहलवानों के साथ कुश्ती हुई, सबमें उन्हें जीत मिली थी. पर, तब स्पेक्टेटर्स को उस पल का बे सब्री से इंतजार था, जब दारा सिंह और किंग कांग की भिड़ंत होती. थोड़े इंतजार के बाद दारा सिंह और किंग कांग अखाड़े पर उतरे. मुकाबले में 200 केजी के किंग कांग के सामने दारा सिंह तो बच्चे लग रहे थे, पर उनका आत्मविश्वास किंग कांग पर भारी पड़ा. दारा सिंह ने किंग कांग को तीन बार पटखनी दे दी. एक बार तो उन्होंने छह फीट लंबे किंग कांग को उठाकर ट्विस्ट करते हुए एरिना से नीचे गिरा दिया था. कुश्ती के दौरान जब-जब दारा सिंह ने किंग कांग को चारों खाने चित किया, तब तब भारी भीड़ ने तालियों से उस स्थान को गूंजा दिया.. नवंबर 1...
पूरे भारत में यह नियम लागू किया जाना चाहिए कि जो भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में है। चाहे वो कलेक्टर हो या SP या कोई अन्य कर्मचारी। सभी के बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढेंगे और जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में न पढते हो उन्हें सरकारी नौकरियों से निकाल दिया जाए। सभी लोग समझ सकते है कि जब जिले के कलेक्टर और SP तथा अन्य अधिकारीयों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ना आरम्भ कर देंगे, तो उन स्कूल में शिक्षा का स्तर क्या होगा और शिक्षक किस तरह की पढाई वहाँ करवाएँगे। सभी शिक्षक स्कूल समय पर आएँगे और अपना कार्य पूरी ईमानदारी से करेंगे। जो शिक्षक किसी जुगाड़ के चलते शिक्षक बने है और पढाने में असमर्थ है वो स्वयं अपना इस्तीफा सरकार को सौंप देंगे। शिक्षा के स्तर में अचानक उछाल आ जाएगा और अपने देश के बच्चे भी मिसाल कायम करेंगे। और उनका इलाज भी सरकारी अस्पताल में ही करवाना जरुरी हो ताकि अस्पतालों की हालत में भी सुधार आ सके जो भी मित्र इस पोस्ट को पढ़ रहे है अगर उन्हें यह सुझाव अच्छा लगे। तो कृपया ये सुझाव और Share करके सरकार तक पहुचाँने मे हमारी मदद करें |